मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

सूरीनाम में कुम्भ पर्व एक अध्यात्मिक अनुभव


सूरीनाम में कुम्भ पर्व एक अध्यात्मिक अनुभव
पारामारिबो। दक्षिण अमेरिकी देश सूरीनाम की राजधानी पारामारिबो शहर में 14 जनवरी 2011 से समुद्र के तट पर प्रवासी भारतीयों के लिए सूर्य कुंभ पर्व का आयोजन किया गया इसमें नेदरलैंड जर्मनी त्रिनिदाद अमेरिका के से आये तमाम लोगो ने भाग लिया नेदरलैंड से अपनी पत्नी के साथ ए हुए हान्स रामचरण का कहना है ये सूर्य कुम्भ पर्व मेरे जीवन का बहुत ही विशेष अनुभव है यहाँ पर हमने हर रोज समुद्र को गंगा मान कर स्नान किया .
प्रश्न- आपकी हिंदी बहुत अची है आप भोजपुरी भी बहुत सुन्दर ढंग से बोल लेते है कहा सीखा अपने ?

उत्तर - हँसते हुए जबाब दिया भोजपुरी हमारी मात्री भाषा है , हिंदी हमने हिंदी फ़िल्म देखते देखते सीखा है .

करीब १४० साल पहले हमरे पूर्वज जब सूरीनाम आये तब वे सभी भोज पूरी बोलते थे हमने अपने माँ बाप से सीखा . घर में हम लोग भोजपुरी ही बोलते है .

प्रश्न - सूर्य कुम्भ का विचार सूरीनाम में ये विचार आपके मन में कहा से आया ?

उत्तर - हमारे परवार के पुरोहित आचार्य शंकर उपाध्याय ने ये विचार पहली बार रखा हम सब को उनके विचार बहुत भाये हम सब मिल कर सहयोग केलिए तेयार हो गए .

प्रश्न - सूरीनाम में इसका असर क्या हुवा ?

उत्तर - अभी तक सूरीनाम में सभी हिन्दू संस्थाए अलग अलग काम करती थी कोई भी इक साथ मिलकर कार्य करने के लिए तीयार नहीं था .आचार्य शंकर के प्रयास से सूरीनाम के इतिहास में पहलीबार सभी संस्थाए एक साथ आकार हिन्दू समाज की एकता का विचार रखा सब एक होकर कम करने का सकल्प लिया . लगता है सब समाज अब एक होकर काम करेगा .

प्रश्न - सूर्य कुम्भ पर्व कब तक चलेगा ?

उत्तर - इसका समापन 18 फरवरी को होगा। इस दौरान यहां दुनिया के सैकड़ों विद्वान सनातन धर्म के माध्यम से विश्व में सुख शांति की स्थापना कैसे हो; समेत कई गंभीर विषयों पर चिंतन-मंथन करेंगे।


सूर्य कुंभ पर्व आयोजन समिति के अध्यक्ष श्रीमान रूदी रामधनी ने बताया कि इस पर्व का आयोजन सूरीनाम में पहली बार हो रहा है। इसमें त्रिनिदाद, गुयाना और अमेरिका सहित विश्व के कई देशों के विद्वानों को आमंत्रित किया गया है तथा इसमें आम जनता का हार्दिक स्वागत है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन उन प्रवासी भारतीयों के लिए एक वरदान है जो भारत पंहुच कर माघ स्नान का पुण्य नहीं प्राप्त कर सकते।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

कुंभ पर्व से मिलेगी सुख व शांति


आरती करते हुए श्रीमान हेमंत प्रसाद शिवदयाल पत्नी के साथ








कुंभ पर्व से मिलेगी सुख व शांति

पारामारिबो। सूरीनाम में आयोजित “सूर्य कुंभ पर्व” के एक कार्यक्रम में देश के लोक निर्माण मंत्री श्री रामवन अब्राहम ने कहा- “यह पर्व देश में सुख, शांति, समता और संस्कार का निर्माण करेगी। मुझे विश्वास है कि देश की शुख शांति के लिए कुंभ मेले में होने वाली प्रार्थना परमेश्वर स्वीकार करेंगे।”

विदित हो कि देश की राजधानी परामारिबो स्थित सूरीनाम नदी के गोवर्धन घाट पर इस मेले का आयोजन किया गया है। मकर संक्रांति से शुरू होकर 18 फरवरी तक चलने वाले इस मेले का उद्घाटन सूरीनाम के राष्ट्रपति देसी बोतरस ने 15 जनवरी को किया था।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारतीय संत स्वामी ब्रह्म वैरागी जी महाराज ने कहा कि भगवान राम ने पूरे जीवन भर समाज को जोड़ने का ही कार्य किया। आज यही कार्य सूर्य कुंभ के द्वारा हो रहा है। स्वामी जी कुंभ परिसर में राम कथा भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए राम कथा से बड़ा कोई साधन नहीं है।

कार्यक्रम में नीदरलैंड सनातन धर्म सभा के अध्यक्ष आचार्य शंकर ने मकर संक्रांति के महत्व पर प्रकाश डाला। त्रिनिदाद से आई हुईं सुश्री अनंदा ने विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल के संदेश का वाचन किया।

पाक में हिंदू व्यापारी की गोली मारकर हत्या


पाक में हिंदू व्यापारी की गोली मारकर हत्या

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के क्वेटा शहर में अपने अपहरण का विरोध करने पर एक हिंदू व्यापारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह जानकारी पुलिस ने दी।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रमेश कुमार की रविवार की कंधारी बाजार स्थित अपनी दुकान की ओर जाते समय हत्या कर दी गई। कार में सवार बंदूकधारियों ने अपहरण करने के इरादे से रमेश को बंदूक की नोक पर रोकने की कोशिश की। उसके विरोध करने पर अपहरणकर्ताओं ने उसकी गोली मारकर हत्या कर दी।
वारदात को अंजाम देने के बाद हमलावर फरार हो गए। अस्पताल के सूत्रों ने बताया, 'सिर में दो गोली लगने से व्यक्ति की मौत हो गई।' गौरतलब है कि पिछले तीन वर्षो में क्वेटा में अपहरण के प्रयास में तीन हिंदू कारोबियों की हत्या की जा चुकी है.

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

हिंदुस्तान से 9000 किमी दूर, घाना में हिंदू मठ



हिंदुस्तान से 9000 किमी दूर, घाना में हिंदू मठ का होना ही बेहद आश्चर्यजनक है,
घाना अफ्रीका के पश्चिमी तटीय इलाके में स्थित है पता चला कि यहां पर एक ठेठ अफ्रीकी हिंदू मठ भी है. घाना सारे देश की बात करें तो यहां ईसाई धर्म की प्रधानता है लेकिन उत्तरी घाना में इस्लाम सबसे ज्यादा प्रभावी है. धर्म से इतर अधिकांश घाना निवासी अब तक अपनी जनजातीय परंपराओं जैसे पूर्वजों की पूजा और ‘दूसरी दुनिया’ में यकीन रखते हैं. घाना में बाहर से आए धर्मों में हिंदू धर्म सबसे नया है, जिसकी जड़ें यहां बसने वाले सिंधी व्यापारियों से जुड़ी हैं. अप्रवासी भारतीयों में इन्हीं सिंधी व्यापारियों का दबदबा है.

अफ्रीकी हिंदू अनुयायियों को अपने परंपरागत अफ्रीकी नाम रखने की पूरी आजादी है. मगर यहां पर कई ऐसे अनुयायी भी हैं जिन्होंने अपने बच्चों को राम और कृष्ण जैसे परंपरागत हिंदू नाम दिए हुए हैं
पहली बार जब मैंने यहां अफ्रीकी हिंदू समुदाय की मौजूदगी के बारे में सुना तो ये मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी. मैंने तय किया कि मैं खुद उस जगह जाकर देखूंगी कि आखिर अफ्रीकी हिंदू समुदाय है कहां और कैसा है?

इस समुदाय की तलाश मुझे घाना की राजधानी अक्रा के उपनगरीय इलाके ऑडोरकोर ले गई. यहीं एक सफेद रंग का भवन, अफ्रीकी हिंदू मठ (एएचएम) स्थित है. मठ के प्रमुख स्वामी घनानंद सरस्वती ने 1975 में इसकी स्थापना की थी. कोमल आवाज वाले स्वामी घनानंद का जन्म एक ठेठ अफ्रीकी परिवार में हुआ था. उनके जन्म के बाद मां-बाप ने ईसाई धर्म अपना लिया. घनानंद भी ईसाई बन गए लेकिन, उनके खुद के मुताबिक, उन्होंने अपनी सत्य की खोज जारी रखी. इस बीच हिंदू मान्यताओं का आकर्षण उन्हें भारत ले आया. यहां वे देश भर में घूमे और योग सीखा. वे हिंदू धर्म से इतना प्रभावित हुए कि ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद के आश्रम में रहते हुए उन्होंने हिंदू धर्म अपना लिया लिया. 35 साल की उम्र में वे वापस घाना आ गए और जल्द ही घाना वासियों को इस प्राचीन पूर्वी धर्म की शिक्षाओं पर व्याख्यान देने लगे. शुरुआत में उनके व्याख्यानों की तरफ कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोग, जैसे वकील और विश्वविद्यालय के अध्यापक आदि अफ्रीकी मूल के लोग ही आकर्षित हुए, लेकिन जल्द ही उन्हें सुनने भारतीय परिवार भी आने लगे. घाना में हिंदू मठ खोलने की प्रेरणा उन्हें स्वामी कृष्णानंद से मिली जो उस समय भारत से घाना की यात्रा पर थे. कृष्णानंद का कहना थी कि मठ में वे लोगों को वो सब कुछ बता सकते हैं जो उन्होंने भारत में सीखा था.




स्वामी घनानंद

आज घाना में तकरीबन 12,500 हिंदू हैं जिनमें से लगभग 10 हजार घनानंद सरस्वती की तरह अफ्रीकी मूल के हैं. हालांकि राजधानी अक्रा में इस समय एक सिंधी और एक सत्य साईं मंदिर है और यहां आनंदमार्गी, इस्कॉन और ब्रह्मकुमारी जैसे हिंदू धार्मिक संगठन भी सक्रिय हैं लेकिन हिंदू धर्म का यहां का सबसे बड़ा उपासना स्थल एएचएम ही है. इस मठ की गतिविधियों में आपको मिश्रित संस्कृति की झलक बड़ी आसानी से देखने को मिल सकती है. मठ के पूजाघर में हिंदू देवी-देवताओं के साथ ईसा की तस्वीर भी लगी हुई है, इसके अलावा दूसरे धर्मो के धार्मिक नेताओं की तस्वीरें भी यहां आपको देखने को मिल जाएंगी. भारत के कुछ धर्म निरपेक्ष नेताओं की तस्वीरें भी यहां पर हैं.
मठ के अनुयायी मानते हैं कि परमसत्ता को यावे (यहूदियों के आराध्य) और अल्लाह जैसे दूसरे नामों से भी जाना जाता है. मुख्य रूप से वैदिक दर्शन को मानने वाले इस मठ के मुख्य देवता विष्णु हैं लेकिन यहां एक शिवमंदिर भी है और दिन की शुरुआत शिवजी के अभिषेक से होती है. इसके बाद आरती होती है. आरती स्वामी घनानंद या उनका कोई शिष्य कराता है. इसके बाद हवन होता है फिर हनुमान चालीसा. अधिकांश भारतीय मंदिरों के उलट हवन में यहां उपस्थित हर व्यक्ति आहुति दे सकता है. हवन के बाद भजन होते जो ज्यादातर हिंदी में ही होते हैं मगर इनमें स्थानीय भाषा का पुट इन्हें असल भजनों से काफी अलग सा बना देता है. सबसे आखिर में वेदों पर चर्चा होती है. यह चर्चा अंग्रेजी या स्थानीय भाषा में होती है.

इस मठ की सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये अपने भीतर न केवल कई धार्मिक परंपराओं को समोए हुए है बल्कि हर नस्ल, समुदाय और धर्म का व्यक्ति यहां बेरोकटोक आ सकता है. यहां के धार्मिक आयोजनों में सिंधी ही नहीं बल्कि हाल ही में घाना आए अप्रवासी भारतीय जिनमें प्रबंधकों से लेकर मजदूरों तक की जमात शामिल होती है. लेकिन मठ आने वालों में सबसे ज्यादा संख्या अफ्रीका के मूल निवासियों की ही है. इनमें भी अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग शामिल हैं. जब मैंने मठ के एक अनुयायी से हिंदूओं में पाई जाने वाली वर्णव्यवस्था पर उसकी राय जाननी चाही तो उसका कहना था कि दुनिया में ऐसा कोई समाज नहीं है जिसमें लोगों से भेदभाव न किया जाता हो, फिर चाहे इसका आधार व्यवसाय हो, जन्म-संबंधी हो या फिर नस्ल को लेकर हो. लेकिन घाना में उसके जैसे हिंदुओं का साफतौर पर मानना है कि हर इंसान को शिक्षा, बेहतर जिंदगी और खासतौर पर अपने धर्म को मानने का अधिकार है.

समन्वयवादी और उदार विचारधारा को मानने वाले इस मठ में सिर्फ एक ही व्यक्ति सन्यासी है. इसके बार में घनानंद कहते हैं, ‘यहां हिंदू धर्म एक नई चीज है और मैं नहीं चाहता कि किसी को दीक्षा दी जाए और वो बाद में सन्यास के रास्ते से हट जाए. इससे हिंदू धर्म बदनाम होगा.’ हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले जो लोग अनुयायी बनना चाहते हैं उन्हें यहां छह सप्ताह रह कर एक कोर्स करना पड़ता है. इसके बाद धीरे-धीरे हिंदू धर्म में दीक्षित किये जाने की प्रक्रिया शुरू होती है.

उदाहरण के तौर पर अफ्रीकी हिंदू अनुयायियों को अपने परंपरागत अफ्रीकी नाम रखने की पूरी आजादी है. मगर यहां पर कई ऐसे अनुयायी भी हैं जिन्होंने अपने बच्चों को राम और कृष्ण जैसे परंपरागत हिंदू नाम दिए हुए हैं, ये भी खास बात है कि ये नाम हिंदू रीति से नामकरण संस्कार के बाद रखे गए हैं. शादियों और अंतिम संस्कार में भी ये लोग हिंदू रीतियों का पालन करते हैं हालांकि ऐसा करना अनिवार्य नहीं है. मठ के हिसाब से हर हिंदू अनुयायी को अपने घर में पूजा और प्रार्थना करनी चाहिए. कभी-कभी उत्साह के अतिरेक में नए अनुयायी इस तरह समर्पित होकर धार्मिक क्रियाएं करते हैं कि लगने लगता है कि ये लोग सिर्फ अभिनय तो नहीं कर रहे. मगर आस्था को लेकर इस तरह के क्रियाकलाप हमारे देश में भी होते हैं, होते रहेंगे. क्योंकि आस्था से जुड़ी हर चीज को समझ पाना शायद संभव ही नहीं है.

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

दक्षिण अमेरिकी देश सूरीनाम के सूर्य कुम्भ पर्व में बुधवार को श्रीराम-जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया गया है।

सूरीनाम कुम्भ में राम-मंदिर निर्माण के लिए प्रस्ताव पारित
सूरीनाम कुम्भ में राम-मंदिर निर्माण के लिए प्रस्ताव पारित

पारामारिबो। दक्षिण अमेरिकी देश सूरीनाम के सूर्य कुम्भ पर्व में बुधवार को श्रीराम-जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया गया है। यह प्रस्ताव कई देशों के करीब तीन हजार श्रद्धालुओं की उपस्थिति में ध्वनिमत से पारित हुआ।

प्रस्ताव में कहा गया है- “भगवान श्रीराम पूरी दुनिया के हिंदुओं के आराध्य हैं। उनकी जन्म-स्थली हमारे लिए पूज्य है। इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह जन्मभूमि को सम्मानपूर्वक हिंदुओं को सौंप दे तथा इसके पक्ष में संसद में एक कानून भी बनाए, ताकि मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके।”

इस दौरान वैरागी अखाड़ा के संत स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद उपाख्य स्वामी ब्रह्मदेव ने अपने संबोधन में कहा कि विश्व में सुख-शांति के लिए हिन्दू एकता जरुरी है। कार्यक्रम के अंत में पंडित शंकर उपाध्याय ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।

उल्लेखनीय है कि सूरीनाम की राजधानी पारामारिबो स्थित सूरीनाम नदी के तट पर पिछले 14 जनवरी से सूर्य कुंभ पर्व का आयोजन किया गया है, जिसका उद्घघाटन वहां के राष्ट्रपति देसी बोतरस ने किया था। इसका समापन 18 फरवरी को होगा। इसमें भारत सहित कई देश के हिंदुओं को भी आमंत्रित किया गया है।

इस दौरान मुख्य रूप से कुम्भ आयोजन समिति के अध्यक्ष महेंद्र प्रसाद रूदी रामधनी, डॉ. देवा सारमान, पंडित शंकर उपाध्याय, पंडित कपूर, पंडित वीरेन अर्जुन शर्मा, श्रीमती गायत्री रामभजन जग्गू, अनूप रामदीन, जीत जिबोधा, शिवदयाल, रोबी पलटन तेवारी और हंस रामचरण उपस्थित थे

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

'कुंभ पर्व से मिलेगी सुख व शांति'


'कुंभ पर्व से मिलेगी सुख व शांति'
पारामारिबो। सूरीनाम में आयोजित “सूर्य कुंभ पर्व” के एक कार्यक्रम में देश के लोक निर्माण मंत्री श्री रामवन अब्राहम ने कहा- “यह पर्व देश में सुख, शांति, समता और संस्कार का निर्माण करेगी। मुझे विश्वास है कि देश की शुख शांति के लिए कुंभ मेले में होने वाली प्रार्थना परमेश्वर स्वीकार करेंगे।”विदित हो कि देश की राजधानी परामारिबो स्थित सूरीनाम नदी के गोवर्धन घाट पर इस मेले का आयोजन किया गया है। मकर संक्रांति से शुरू होकर 18 फरवरी तक चलने वाले इस मेले का उद्घाटन सूरीनाम के राष्ट्रपति देसी बोतरस ने 15 जनवरी को किया था। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारतीय संत स्वामी ब्रह्म वैरागी जी महाराज ने कहा कि भगवान राम ने पूरे जीवन भर समाज को जोड़ने का ही कार्य किया। आज यही कार्य सूर्य कुंभ के द्वारा हो रहा है। स्वामी जी कुंभ परिसर में राम कथा भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए राम कथा से बड़ा कोई साधन नहीं है। कार्यक्रम में नीदरलैंड सनातन धर्म सभा के अध्यक्ष आचार्य शंकर ने मकर संक्रांति के महत्व पर प्रकाश डाला। त्रिनिदाद से आई हुईं सुश्री अनंदा ने विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंहल के संदेश का वाचन किया। “सूर्य कुंभ पर्व आयोजन समिति” के अध्यक्ष महेंद्र प्रसाद रूदी रामधनी ने दूरभाष पर "विश्व हिंदू वॉयस" को बताया कि मकर संक्रांति के दिन लाखों श्रद्धालु कुंभ परिसर में सुबह 5 बजे से ही स्नान के लिए पहुंचने लगे थे जो रात 7 बजे तक जारी रहा। उन्होंने बताया कि स्नान के बाद आचार्य शंकर ने रूद्र-अभिषेक कराया। इसमें श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था।

विश्व शांति हेतु सूरीनाम में सूर्य कुंभ का आयोजन



विश्व शांति हेतु सूरीनाम में सूर्य कुंभ का आयोजन
दक्षिण अमेरिकी देश सूरीनाम में 14 जनवरी से सूर्य कुंभ पर्व का आयोजन किया जा रहा है। इसका उद्घाटन वहां के राष्ट्रपति श्री देसी बोतरस करेंगे। देश की राजधानी पारामारीबो में सूरीनाम नदी के तट पर आयोजित होने वाले इस कुंभ मेले का समापन 18 फरवरी को होगा। देश के इतिहास में इस प्रकार के मेले का आयोजन पहली बार हो रहा है। इसको लेकर सूरीनाम के अलावा त्रिनिडाड, अमेरिका, नार्वे, फ्लोरिडा, नीदरलैंड; आदि देशों के हिंदुओं में काफी उत्साह है। इस पर्व में भारत और सूरीनाम सहित दुनिया के सैंकड़ो विद्वान हिस्सा लेंगे। इस संदर्भ में “विश्व हिंदू वॉयस” न्यूज वेब-पोर्टल से जुड़े पवन कुमार अरविंद ने नई दिल्ली से दूरभाष पर सूरीनाम में “सूर्य कुंभ पर्व आयोजन समिति” के अध्यक्ष श्री महेंद्र प्रसाद रूदी रामधनी से बातचीत की है। प्रस्तुत है अंश- Que।

कुम्भ पर्व के आयोजन की प्रेरणा आपको कहां से मिली?Ans।

इसकी प्रेरणा मुझे आचार्य शंकर से मिली। आचार्य जी सूरीनाम के कारीगांव के निवासी हैं। वह हालैंड व सूरीनाम में सनातन धर्मसभा के अध्यक्ष हैं। उन्होंने ही मुझे इस कार्य के लिए प्रेरित किया। समय-समय पर उनसे आवश्यक सुझाव भी मुझे मिलता रहता है।

Que. इसके आयोजन का स्वरूप क्या है? Ans।

इस आयोजन में सभी लोगों का हार्दिक स्वागत है। हमें उम्मीद है कि इसमें सूरीनाम के बाहर के लोग भी भारी संख्या में हिस्सा लेंगे। सूरीनाम व भारत के अलावा त्रिनिडाड, अमेरिका, नार्वे, गुयाना, फ्लोरिडा, नीदरलैंड समेत दुनिया के कई देशों के विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया है, जो विश्व में सुख-शांति की स्थापना और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार सहित कई गंभीर विषयों पर चिंतन-मंथन करेंगे। पर्व के दौरान सूरीनाम के सभी मंदिरों से कलश पूजन करके कुंभ परिसर में लाया जाएगा। कलश पूजन में हिस्सा लेने वाले लोग कुंभ के दौरान भजन-कीर्तन भी करेंगे, ऐसी योजना बनाई गई है। इस दौरान श्रद्धालु वैरागी अखाड़ा के भारतीय संत स्वामी ब्रह्मस्वरूपानंद जी महाराज के प्रवचन का आनंद भी उठा सकते हैं। वे पिछले कई वर्षों से विदेशों में रामकथा व भागवतकथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रचार-प्रसार के कार्य में सक्रिय

Que। कुंभ मेला भारत में लगता है, फिर सूरीनाम में आप क्यों आयोजित कर रहे हैं?

Ans। हम लोग भारतीय मूल के हैं। हमारे पूर्वज आज से करीब 170 वर्ष पूर्व गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम और त्रिनिडाड; आदि देशों में आए थे। भारतीय मूल का होने के कारण वहां की संस्कृति और सभ्यता से गहरा जुड़ाव है। सूरीनाम की जनसंख्या करीब पांच लाख है, जिसमें करीब 38 प्रतिशत हिंदू हैं। भारत में जो कुंभ लगता है उसका बहुत बड़ा महत्व है। उसके आयोजन का महात्म्य समुद्र मंथन से जुड़ा है। भारत में हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में हर बारहवें एवं छठवें वर्ष क्रमशः कुंभ व अर्द्धकुंभ मेले का आयोजन होता है। इन आयोजनों में विश्व भर के लाखों लोग हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा ऐसे भी लोग हैं जिनको आर्थिक कारणों से भारत पंहुचना संभव नहीं हो पाता। उनके लिए इसके विकल्प के तौर पर सूरीनाम में कुम्भ मेले का आयोजन किया जा रहा है। मुझे विश्वास है कि यह आयोजन उन सभी प्रवासी भारतीयों के लिए एक वरदान साबित होगा, जो भारत पंहुच कर माघ स्नान का पुण्य नहीं प्राप्त कर सकते।
Que. इसके आयोजन का क्या उद्देश्य है?

Ans। सूरीनाम में सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार ही इस आयोजन का उद्देश्य है। इसके अलावा सनातन धर्म को मानने वाले दुनिया के सभी साधु-संत और विद्वान एक जगह एकत्रित होकर विश्व के लिए सुख शांति का मार्ग खोज सकें, भी उद्देश्य है। इसके आयोजन के लिए ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती समेत कई संतों ने शुभकामनाएं दी हैं।

Que. विश्व शांति में भारतीय संस्कृति और सभ्यता का क्या योगदान है?

Ans। मेरे विचार से भारतीय संस्कृति और सभ्यता को ही सनातन धर्म कहा जाता है। दुनिया में इसके प्रचार का उद्देश्य सभी मत, पंथ और सम्प्रदाय के लोगों में एकता स्थापित करना है। मुझे यह विश्वास है कि सनातन धर्म सत्य पर आधारित है और सत्य की स्थापना से ही विश्व में शांति की स्थापना हो सकेगी।

Que। अपने बारे में कुछ बताइए?Ans।

मेरी पैदाइश और शिक्षा-दीक्षा सूरीनाम में हुई। शिक्षा के बाद मैंने व्यापार शुरू किया। ईश्वर की कृपा से मेरा व्यवसाय ठीक चल रहा है। समाजिक कार्यों को करने से मानसिक शांति की अनुभूति होती है। इसलिए जब तक शरीर में सांस है, करते रहने का प्रयास करता रहूंगा।